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गढ़वाल राइफल्स के 2 शूरवीरों को 103 साल बाद देश की मिट्टी नसीब होगी, World War 1 के हीरो रहे

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POST BY : UPLOADER LEAKS

गढ़वाल राइफल्स के गढ़वाली सैनिकों का शोर्य और वीरता के क़िस्से तो आपने सुने ही होंगे। अगर गढ़वाली सैनिक दुश्मन के सामने खड़ा हो जाये तो दुश्मन की मज़ाल नही की वो आगे एक कदम भी बड़ पाये। अगर आपने हॉलीवुड फिल्म डनक्रीक देखी है, तो आप World War-1 की उस खूनी लड़ाई के बारे में जानते ही होंगे।

प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीय सैनिक भी लड़े थे। हज़ारो भारतीय सैनिक अपने देश भारत वापस नही आ पाये और उन्हे देश की मिट्टी नसीब भी ना हो पाई। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान फ्रांस के डनक्रीक मे इतिहास की सबसे खूनी लड़ाई हुई थी। World War-1 के दौरान यही सबसे ज़ादा सैनिक मारे गये थे।

फ्रांस में मिले गढ़वाली सैनिकों के अवशेष आखिरकार 16 नवंबर को भारत लाए जाएंगे । 103 वर्षों के बाद इन दो गढ़वाली सैनिकों को वतन की मिट्टी नसीब होगी । देश को ऐसे शूरवीरों पर गर्व होगा कि उसने ऐसे शूरवीर पैदा किये हैं जो अपनी वीरता के किस्सों से पूरी दुनिया में अपने देश भारत का नाम रोशन करते रहे हैं । गढ़वाल राइफल के शौर्य और साहस के किस्से तो आपने सुने ही होंगे।

गढ़वाली सैनिको को कंधे पर लगे घातु के बेच से पहचाना गया:-

फ्रांस के रिचबर्ग नामक स्थान जो की डनक्रीक से 70 KM दूर स्थित है, वहाँ पर खुदाई के दौरान दो गढ़वाली सैनिकों के अवशेष मिले थे । भारत सरकार को इस बारे में सूचना दी गई थी और सैनिकों की शिनाख्त के लिए बुलावा भेजा गया था । खबरों के मुताबिक दोनों अवशेषों के कंधों पर 39 टाइटल शोल्डर थे जो इस बात का पुख्ता सबूत है कि दोनों ही अवशेष 39 गढ़वाल राइफल्स के हैं ।

इसी आधार पर फ्रांस की सरकार ने भारत की सरकार को इस दोनों अवशेषों की शिनाख्त के लिए बुलावा भेजा था । ये खबर मिलते ही लैंसडौन सैन्य अधिकारियों का एक दल फ्रांस रवाना हो गया है। फ्रांस सरकार द्वारा भारत को आमंत्रण दिए जाने के बाद गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों की टीम फ्रांस पहुंच गई है।

सूत्रों की मानें तो लैंसडौन से सेना के दो अधिकारियों के साथ सैन्य अधिकारियों की टीम दिल्ली में आवश्यक कागजी कार्रवाई को सम्पन्न करने के बाद के फ्रांस के लिए रवाना हुई थी। दोनों जवानों के अवशेषों की जांच के बाद सैन्य अधिकारियों की टीम अपने रणबांकुरों को पहले रिचबर्ग में ही श्रद्धांजलि देगी। साथ ही उन्होंने सैन्य प्रतिनिधिमंडल के रणबांकुरों के अवशेष लेकर फ्रांस से 16 नवंबर तक स्वदेश वापसी की संभावना जताई है।

डनक्रीक से 70 दूर 2 भारतीय गढ़वाल राइफल्स के सैनिको के अलावा ब्रिटिश और जर्मन सैनिकों के कंकाल भी मिले हैं गढ़वाल राइफल्स के सैनिको को उनके कंधे पर लगे घातु के बने बेच से पहचाना गया। गढ़वाली सैनिकों के सोल्डर पर 39 लिखा है, जिससे यह समझा जा रहा है कि दोनों सैनिकों का 39 गढ़वाल राइफल्स से संबध रहा है । 103 वर्षों के बाद दोनों गढ़वाली सैनिक अपनी मातृभूमि वापस आयेंगे ।

गढ़वाली सैनिकों को तूफानी टुकड़ी कहा जाता था:-

प्रथम महायुद्ध में गढ़वाल की सेना ने अपनी अलग ही विशेष साहसी छाप छोड़ी थी । जर्मन सैनिकों के बीच गढ़वाली सैनिकों की टोली तूफानी टुकड़ी के नाम से प्रसिद्ध थी। गढ़वाली ब्रिगेड 2/39 बटालियन 21 सितंबर 1914 को करांची से होते हुये 13 अक्तूबर को फ्रांस के बंदरगाह मार्सेल्स पहुंची और मोर्चे पर डट कर डनक्रीक की उस ऐतिहासिक लड़ाई में अपना साहसिक योगदान दिया।

10 मार्च 1915 के न्यू चैपल युद्ध में गढ़वाल राइफल्स के ही राइफलमैन गबर सिंह ने निर्णायक भूमिका निभाई थी । उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए वीरगति प्राप्त की और उन्हें मरणोपरांत विक्टोरिया क्रास से सम्मानित किया गया था । इस युद्ध में विशिष्ट वीरता के लिए छह गढ़वाली सैनिकों को मिलिट्री क्रास से अलंकृत किया गया था ।

प्रथम विश्वयुद्ध में 23 नवंबर 1914 को जर्मन सेना के बमों की परवाह न करते हुए अपनी जान हथेली पर रखकर गढ़वाली सैनिकों ने 300 गज लंबी खाई पर अकेले ही कब्जा कर लिया था । इस युद्ध में अद्भुत वीरता के लिए गढ़वाल रायफल्स के नायक दरबान सिंह को ब्रिटिश सरकार द्वारा सर्वोच्च सम्मान विक्टोरिया क्रास से नवाजा गया था ।

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Nitin Chourasia
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