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रहस्यमय माता मंदिर में बकरे की बलि देने पर भी बकरा ज़िंदा रहता है, दुनिया के सबसे पुराने मंदिर होने का दावा

MundeshwariMataMandir MundeshwariTempleHistory
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POST BY : UPLOADER LEAKS

ये मंदिर प्राचीन मंदिरों में से एक है कैमूर के भगवानपूर अंचल में पड़ने वाला मुंडेश्वरी माता का ये मंदिर पहाड़ी पर स्थित है। ज्यादातर लोग इसे चमत्कारी मंदिर ही मानते हैं। इस पवरा पहाड़ी की ऊंचाई करीब 600 फीट मानी जाती है। बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 108ई. में हुआ था, हालांकि यहां पुरातत्व सर्वे का बोर्ड भी लगा हुआ है जिससे पता चलता है कि ये मंदिर 635 ई. से पहले अस्तित्व में था।

मुंडेश्वरी मंदिर बिहार के सबसे प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। अगर आप भी मुंडेश्वरी माता के दर्शन के लिए जाना चाहते हैं तो यहाँ पहुँचने के लिए मुगलसराय और गया के रेलवे लाइन पर भभुआं रोड रेलवे स्टेशन हैं यहां आपको उतरना होगा. फिर यहां से 25 किमी दूर इस मंदिर के लिए गाड़ियां मिल जाती हैं।

पहाड़ी पर स्थित मंदिर के बारे में गड़रियों के जरिए पहली बार पता चला था। ये गड़ेरिए अपनी बकरियों को चारा खिलाने के लिए पहाड़ियों के ऊपर गए थे जब उन्होंने देखा कि यहां अष्टकोणिय मंदिर है और माता की मूर्ति के साथ ही एक प्राचीन शिवलिंग भी है। यहां कई शिलालेख भी पाए गए जिससे इसकी ऐतिहासिक अहमियत की पुष्टि होती है।

देश के विभिन्न शक्तिस्थलों में बलि देने की प्रथा होती है, लेकिन बिहार के कैमूर जिले में स्थित प्रसिद्घ मुंडेश्वरी मंदिर में बलि देने की प्रथा का तरीका इसे अन्य शक्तिस्थलों से अलग करता है। यहां बलि देने की परंपरा पूरी तरह सात्विक है। यहां बलि तो दी जाती है, लेकिन उसका जीवन नहीं लिया जाता। बकरे की बलि कुछ समुदाय में आम है।

इस मंदिर में बकरे की बलि का नायाब तरीका है जिससे उसकी मौत भी नहीं होती है। लोग जो बताते हैं उस पर भरोसा भी नहीं हो पाता है। बताया जाता है कि पहले बकरे को देवी के सामने लाया जाता है, यहां के ब्राह्म उस पर चावल छिड़कते हैं, चावल छिड़कने के साथ ही बकरा अपने आप बेहोश हो जाता है, बलि की प्रक्रिया पूरी मान ली जाती है और उसे बाहर छोड़ दिया जाता है।

मुंडेश्वरीधाम की महिमा वैष्णो देवी और ज्वाला देवी जैसी मानी जाती है। काफी प्राचीन माने जाने वाले इस मंदिर के निर्माण काल की जानकारी यहां लगे शिलालेखों से पता चलती है। मंदिर परिसर में मिले शिलालेखों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 635-636 ईस्वी के बीच का हुआ था। मुंडेश्वरी के इस अष्टकोणीय मंदिर का निर्माण महराजा उदय सेन के शासनकाल का माना जाता है।

इस मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण दिशा की ओर है। 608 फीट ऊंची पहाड़ी पर बसे इस मंदिर के विषय में कुछ इतिहासकारों का मत है कि यह मंदिर 108 ईस्वी में बनवाया गया था। माना जाता है कि इसका निर्माण शक शासनकाल में हुआ था। यह शासनकाल गुप्त शासनकाल से पहले का समय माना जाता है।

मंदिर परिसर में पाए गए कुछ शिलालेख ब्राह्मी लिपि में हैं, जबकि गुप्त शासनकाल में पाणिनी के प्रभाव के कारण संस्कृत का प्रयोग किया जाता था। यहां 1900 वर्षों से पूजन होता चला आ रहा है। मंदिर का अष्टाकार गर्भगृह आज तक कायम है। गर्भगृह के कोने में देवी की मूर्ति है जबकि बीच में चर्तुमुखी शिवलिंग स्थापति है।

यहाँ भगवान शिव का एक पंचमुखी शिवलिंग है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका रंग सुबह, दोपहर और शाम को अलग-अलग दिखाई देता है। जानकार यह मानते हैं कि उत्तर प्रदेश के कुशीनगर और नेपाल के कपिलवस्तु का मार्ग मुंडेश्वरी मंदिर से जुड़ा हुआ था।

Mundeshwari Mata Temple Mystery :

The Oldest Temple In The World Is Mundeshwari Temple Bhabhua Kaimur Bihar.

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Nitin Chourasia
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